निबंध

ESSAY

आप किस सच के साथ हैं?

कहते हैं कि लोग अक्सर खबरों को याद नहीं रखते, लेकिन खबरों को याद रखने के अपने कष्ट हैं। खासकर खबरें जब पर्यावरण की हों और आप उसके लिए संवेदनशील हों।

कई साल से हम यही पढ़ रहें हैं कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हर गर्मी, बरसात, जाड़े में इसकी खबरें आती हैं। पता चला कि गंगोत्री ग्लेशियर पिघल रहा है तो हमने लगे हाथ मोटर गाड़ियों के जरिये वहां जाने वाले आस्थावान लोगों को खूब कोसा। यहीं कर लेते गंगा स्नान इतना ऊपर जाने की जरूरत ही क्या थी। फिर पता पड़ा कि चोरबाड़ी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। केदारनाथ के होटलों ढाबों के धुंए और वहां तक मंडराने वाले हैलीकाप्टर ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। नए तीर्थयात्रियों के लिए तो क्या कहा जाए, जो एक बार केदारनाथ के माहौल से रूबरू हुआ है क्या अगली बार वह अपने कदमों को रोक सकता है? यह भी अक्सर पढ़ने में आ जाता है कि कौन सा ग्लेशियर कितने इंच, सेंटीमीटर या वर्गमीटर तक पिघल गया। पाठकों या दर्शकों को ग्लोबल वार्मिग का भय बेचना हो तो ग्लेशियर के पिघलने के तथ्यों का इस्तेमाल सबसे अच्छे सबूत के तौर पर किया जा सकता है।

पर अब इसकी उल्टी खबरें भी आ रही हैं। अब कहा जा रहा है कि ग्लेशियर ज्यादा पिघल नहीं रहे। कम से कम असामान्य रूप से तो नहीं ही पिघल रहे। उन ग्लेशियर की सूची भी आ रही है जिनका आकार बजाए घटने के बढ़ रहा है। जिस सियाचिन ग्लेशियर पर भारत और पाकिस्तान की फौज आमने सामने बंदूके ताने खड़ी रहती है वह तो भारत-पाक रंजिश की तरह से बढ़ा ही जा रहा है। लाहौल के मैनतोसा ग्लेश्यिर की कहानी तो और भी अजब है। आस पास विद्युत परियोजनाएं लग रही हैं और यह बढ़ता जा रहा है। 1962 के नक्शे पर यह जहां था अब उससे तकरीबन एक किलोमीटर आगे बढ़ चुका है। इसका पड़ोसी ग्लेश्यिर पलवो भी उसी राह पर है लेकिन उसके बढ़ने की रफ्तार जरा कम है।

तो अब आप क्या मानेंगे?

गौर करें तो कुछ विशेषज्ञ ग्लेशियर घटने को लेकर चर्चा में हैं, तो कुछ ग्लेश्यिर बढ़ने को लेकर। एक लॉबी ग्लेश्यिर का घटना बेच रही है तो दूसरी उनका बढ़ना। ग्लोबल वार्मिग का भय हमें अपने भविष्य के प्रति चिंताएं देता है।

लेकिन शायद इन दोनों लॉबी के लोग अपने भविष्य को लेकर निश्चिंत होंगे।

हो सकता है कि दोनों ही बातें एक साथ सच हों। लेकिन क्या एक भी ऐसा विशेषज्ञ नहीं है जो दोनों ही सच को एक साथ स्वीकार कर एक नया नजरिया पेश कर सके?

साभार : http://blogs.livehindustan.com/aao-kuch-baat-karein/2009/11/14/